YAHA KYA HAI?
यहाँ क्या है?
हम हमेशा अपने आसपास यह बात सुनते या दौहराते रहते है और हम लोगो ने अपनी एक आदत सी बना ली है.
"यहाँ क्या है?"
हम हमेशा अपने आसपास यह बात सुनते या दौहराते रहते है और हम लोगो ने अपनी एक आदत सी बना ली है.
"यहाँ क्या है?"
अगर हम किसी छोटे गाओं में हो, तो यहाँ क्या है? बड़े गाओं में जाओ वहा देखो!
अगर हम बड़े गाओं में रहे तो फिर सुनने में आता है "यहाँ क्या है?" किसी शहर में जाओ
अगर कोई शहर में रहता है तो फिर वही बात " यहाँ क्या है?" अच्छे बड़े शहर में जाओ
लो भाई आ गए बड़े शहर में अब तो ठीक है? फिर भी सुनने में आता ही है यहाँ क्या है? बड़े से बड़े शहर में जाओ जिसे हम मेट्रो शहर कहते है?
अब इससे बड़ा शहर ही नहीं है हिन्दुतान में, अब तो ठीक है है? अरे किसी विदेश में जाओ यहाँ क्या है?
यह सोच हमे आर्थिक, सामाजिक, मानसिक या किसी भी प्रकार से संतुष्ठ नहीं मिलने के कई कारणों में का एक बड़ा कारण बन रही है. हर कोई अपनी जगह को छोटा समझता है और बड़े जगह जाके बड़ा बनना चाहता है. अच्छी बात है. हर एक को लगता है जो मुझ से बड़ी जगह में है वह खुश है. छोटी जगह में कुछ नहीं हो सकता ऐसी अनगिनत न्यूनताओ से हम भर गए है और दुसरो को भी भर रह है. अगर हम जरा गौर करे तो ध्यान में आता है हर जगह बस समस्याए बढ़ रही है.
कई ऐसे देश, शहर, गाओं है जहा के लोगो ने अपनी जगह रह कर अपने उस जगह को दुनिया के नक़्शे पे लेन का काम किया है. हर कोई वह काम नहीं कर सकता। हर किसी को अपने सपने देखना या जहा चाहे जाने की आजादी भी है तो कही मज़बूरी भी. यह भी बात सच है जब हमारी जरूरतें पूरी नहीं होती, हमे सुविधाएं नहीं मिलती तब कई बार लगता है यहाँ क्या है?
ऐसा सुना है के छोटी छोटी बातो से बड़े परिणाम होते है. हम अपनी जगह का अभिमान ना रखे ना सही, अभिमान रखने जैसा वहा कुछ ना रहे ना सही पर क्या यह बोलना जरूरी है "यहाँ क्या है?"
कोई कहेगा जरा सोचिये यहाँ क्या नहीं है? और हमारे गाओं, शहर, देश के इतिहास के उदाहरण देगा पर सवाल बड़ा यह है के यहा क्या हो सकता है?
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